क्या नेपोकिड्स को बचा रहे हैं टैलेंटेड एक्टर्स? Aankhon Ke Gustakhiyaan में Vikrant Massey की दमदार एक्टिंग, क्या फिल्म देखनी चाहिए या नहीं – जानिए रिव्यू।

आज के समय में ऐसा लगता है कि जो सेल्फ-मेड एक्टर्स हैं और वाकई में टैलेंटेड हैं, उनका काम नेपोकिड्स के करियर को बचाना और उन्हें सहारा देना बन गया है. फिल्म ‘आंखों के गुस्ताखियां’ देखने के बाद भी कुछ ऐसा ही महसूस हुआ, और आप जानना चाहते हैं कि यह फिल्म कैसी है, देखने लायक है या नहीं, और इसमें पैसा लगाना चाहिए या स्किप कर देना चाहिए. तो चलिए, इस बारे में विस्तार से बात करते हैं.
क्या विक्रांत मैसी ने बचाई शनाया कपूर की फिल्म?

यह सवाल आजकल हर बॉलीवुड फैन के मन में आता है. एक तरफ जहां नेपोटिज्म की बहस गरम है, वहीं कुछ टैलेंटेड एक्टर्स ऐसे भी हैं जो अपनी मेहनत और काबिलियत के दम पर इंडस्ट्री में अपनी जगह बना रहे हैं. लेकिन क्या यह वाकई सच है कि इन एक्टर्स को नेपोकिड्स के करियर को सहारा देना पड़ता है? ‘Aankhon Ke Gustakhiyaan‘ को देखकर तो कुछ ऐसा ही लगता है.
Aankhon Ke Gustakhiyaan Movie Review की कहानी

फिल्म की कहानी थोड़ी यूनिक है. यह विक्रांत मैसी और शनाया कपूर के किरदारों के इर्द-गिर्द घूमती है, जो दोनों ही दृष्टिहीन (ब्लाइंड) हैं. विक्रांत मैसी यहां ‘जाना’ नाम के एक संगीतकार का किरदार निभा रहे हैं, जो अपनी भावनाओं को केवल संगीत के जरिए व्यक्त कर पाते हैं. वहीं, शनाया कपूर ‘सबा शेरगिल’ के रोल में हैं, जो एक थिएटर आर्टिस्ट हैं.

ये दोनों एक ट्रेन में मिलते हैं, और यहीं से इनकी प्रेम कहानी शुरू होती है. इनकी मुलाकातें बढ़ती हैं और धीरे-धीरे प्यार में बदल जाती हैं. लेकिन कहानी में एक ट्विस्ट है – ये दोनों एक-दूसरे से यह बात छुपाते हैं कि वे देख नहीं सकते. फिल्म इसी बात पर केंद्रित है कि प्यार होने के बाद उन्हें किन जटिलताओं और चुनौतियों का सामना करना पड़ता है.
डायरेक्टर ने इस प्रेम कहानी को बहुत ही दिल को छू लेने वाले तरीके से दिखाया है. अगर आप एक सच्चे रोमांटिक हैं, तो यह कहानी आपके दिल को पिघला सकती है. लेकिन अगर आप उन लोगों में से हैं जो हमेशा फिल्में देखते रहते हैं और इस तरह के रोमांस से ऊब चुके हैं, तो शायद आपको थोड़ा कम मजा आए. फिल्म देखते हुए बार-बार यह ख्याल आता है कि काश इसे सिर्फ एक रोमांटिक मूवी न बनाकर, ‘अंधाधुन’ की तरह थ्रिलर या सस्पेंस का तड़का भी दिया होता. दूसरी बंदी भी वैसी ही कैरेक्टर प्ले कर रही है, तो कहानी में और भी जबरदस्त ट्विस्ट और त्रासदी देखने को मिल सकती थी. हालांकि, डायरेक्टर ने अपना काम बखूबी किया है और कहानी को दर्शकों के दिल तक पहुंचाने में कामयाब रहे हैं.
परफॉरमेंस: Vikrant Massey का जलवा!
इस फिल्म की जान अगर कोई है, तो वो हैं विक्रांत मैसी. यह बंदा वाकई हर तरह के किरदार में जान डाल सकता है, और ‘जाना’ का किरदार भी इसका एक और उदाहरण है. विक्रांत मैसी का परफॉरमेंस ही इस फिल्म को ऊंचाई पर ले जाता है. वे अपने किरदार को इतनी संवेदनशीलता और गहराई से निभाते हैं कि आप उनसे जुड़ाव महसूस करने लगते हैं.
शनाया कपूर का किरदार भी ठीक-ठाक है, लेकिन विक्रांत मैसी के सामने उनका परफॉरमेंस थोड़ा फीका लगता है.
म्यूजिक: सुनने में अच्छा, लेकिन यादगार नहीं
फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक फिल्म देखते समय तो आपका साथ देता है, लेकिन ऐसा कोई गाना नहीं है जिसे आप थिएटर से बाहर आकर गुनगुना सकें या याद रख सकें. हां, फिल्म के दौरान जो भी गाने आते हैं, वे दिल को सुकून देते हैं और सुनने में अच्छे लगते हैं. जब जाना और सबा शेरगिल अलग होते हैं, उस वक्त आने वाले कॉम्प्लिकेशंस को और ज्यादा पीड़ादायक दिखाने के लिए म्यूजिक को और बेहतर बनाया जा सकता था. गाने और अच्छे हो सकते थे, लेकिन कुल मिलाकर जितना भी था, वो ठीक था.
क्यों देखें यह फिल्म?
अगर आप छोटी-छोटी बातों में रोमांस ढूंढते हैं, आपको पहली मुलाकात, प्यार, जुदाई और फिर से मिलने का सफर पसंद है, और आप ऐसी फिल्म देखना चाहते हैं जो आपको गुड फील करवाए, तो यह फिल्म आपके लिए ही है. इस फिल्म का मुख्य मुद्दा सेल्फ-एक्सेप्टेंस है. यह दुनिया को दो ऐसे लोगों की नजर से दिखाती है जो देख नहीं पाते हैं, जहां स्पर्श (टच), ध्वनि (साउंड) और भावनाएं (इमोशन) ही सब कुछ हैं.
फाइनल वर्डिक्ट: देखें या स्किप करें?
क्या आपको ‘आंखों के गुस्ताखियां’ देखनी चाहिए? हाँ, बिल्कुल!
अगर आप कपल हैं, तो इसे एक साथ जाकर देखना चाहिए. अगर आप अकेले हैं, तो भी इसे देख सकते हैं. यह फिल्म प्यार को एक अलग नजरिया देती है. ऐसा कुछ भी नहीं है कि आपको यह मूवी स्किप कर देनी चाहिए. यह एक ऐसी फिल्म है जिसे देखना वाकई जरूरी है.
यह था मेरा इस फिल्म पर एक ईमानदार रिव्यू. आपने यह फिल्म देखी है या देखने का प्लान कर रहे हैं? आपको यह कैसी लगी, कमेंट करके जरूर बताएं!
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